बायबैक क्या है — कंपनी अपने ही शेयर क्यों खरीदती है, और टेंडर किया हर शेयर क्यों नहीं बिकता
शेयर बायबैक क्या होता है: कंपनी अपने ही शेयर वापस खरीदती है। tender offer के कदम, छोटे शेयरधारकों का 15% कोटा, और 1 अप्रैल 2026 से बदला टैक्स।
एक लाइन में
शेयर बायबैक (buyback, यानी वापस खरीदना) का मतलब है कि कंपनी अपने ही शेयर अपने शेयरधारकों से पैसे देकर वापस खरीद ले। खरीदे गए शेयर रद्द (extinguish) कर दिए जाते हैं, इसलिए बायबैक के बाद कंपनी के कुल शेयरों की गिनती घट जाती है।
लिस्टेड कंपनी के बायबैक के नियम Companies Act, 2013 और SEBI (शेयर बाजार का नियामक) के Buy-Back Regulations, 2018 में हैं। इस लेख में दो रास्तों की बात है: tender offer (तय भाव पर, तय दिनों में शेयर देने का न्योता) और stock exchange के जरिये open market (खुले बाजार) से खरीद।
शेयर देना या न देना हर शेयरधारक की अपनी मर्जी है। यहां लिखे नियम और टैक्स 29 सितंबर 2026 तक के हैं। बायबैक का टैक्स पिछले दो साल में दो बार बदला है, और open market वाला रास्ता बंद होकर फिर खुला है।
कंपनी अपने ही शेयर वापस क्यों खरीदती है
सीधी वजह: कंपनी जमा मुनाफे का कुछ हिस्सा शेयरधारकों को लौटाना चाहती है। डिविडेंड भी यही करता है। जुलाई 2024 के बजट के साथ आए सरकारी memorandum (वित्त विधेयक की व्याख्या) में भी दोनों को जमा मुनाफा बांटने के तरीके कहा गया है।
फर्क यह है कि डिविडेंड हर शेयर पर मिलता है। बायबैक में पैसा सिर्फ उसे मिलता है जो शेयर दे, और उतने ही शेयरों पर जितने कंपनी ले। जो नहीं देता, उसके शेयर उतने ही रहते हैं, पर कुल शेयर घटने से कंपनी में उसका हिस्सा थोड़ा बढ़ जाता है।
यही बात प्रमोटर (कंपनी पर नियंत्रण रखने वाला मालिक समूह) पर लागू होती है। मान लीजिए एक काल्पनिक कंपनी के 10 करोड़ शेयरों में से 5 करोड़ प्रमोटर के पास हैं, यानी 50%। कंपनी बाकी लोगों से 1 करोड़ शेयर खरीद ले, तो प्रमोटर के 5 करोड़ अब 9 करोड़ में से हैं, यानी करीब 55.6%।
कंपनी कितना खरीद सकती है, इसकी हद तय है: paid-up capital (शेयरों से जुटाई मूल पूंजी) और free reserves (जमा मुनाफा) के जोड़ का 25%। 10% तक का बायबैक board of directors (निदेशक मंडल) खुद मंजूर कर सकता है; उससे ऊपर शेयरधारकों का special resolution (खास प्रस्ताव) चाहिए।
दो रास्ते: tender offer और open market
Tender offer में कंपनी एक तय भाव और एक record date (वह तारीख जिस दिन के शेयरधारक गिने जाते हैं) बताती है। उस दिन के शेयरधारक ऑफर में अपने शेयर दे सकते हैं। ऑफर 5 working days (कामकाजी दिन) खुला रहता है; SEBI ने 9 मार्च 2023 से यह अवधि 10 से घटाकर 5 दिन की।
Open market बायबैक में न record date होती है, न सबके लिए एक भाव। कंपनी तय अवधि में stock exchange से, बाजार भाव पर और एक अधिकतम भाव तक, शेयर खरीदती है। SEBI के मुताबिक अब यह आम सौदे की तरह ही होता है। इसमें प्रमोटर अपने शेयर नहीं बेच सकते, और कंपनी को रोज stock exchange को बताना होता है कि उसने कितने शेयर खरीदे।
SEBI ने 9 मार्च 2023 से लागू संशोधन में इस रास्ते की हद और अवधि धीरे-धीरे घटाई, और 1 अप्रैल 2025 से इसे बंद कर दिया। 1 जुलाई 2026 को जारी संशोधन से यह 1 अगस्त 2026 से फिर खुला है; SEBI ने इसकी वजह बायबैक का बदला हुआ टैक्स बताई।
नए नियम में यह बायबैक paid-up capital और free reserves के 15% से कम होना चाहिए। ऑफर public announcement (सार्वजनिक घोषणा) के 4 working days के अंदर खुलना चाहिए, और खुलने के 66 working days के अंदर बंद होना चाहिए।
बायबैक के दौरान प्रमोटर के सौदों पर रोक पहले से थी। 1 अगस्त 2026 से प्रमोटर, प्रमोटर ग्रुप और उनके associates (उनसे जुड़े लोग या इकाइयां) के ऐसे शेयर बायबैक का प्रस्ताव पास होने के दिन से ऑफर बंद होने तक depository के स्तर पर frozen (लेन-देन पर रोक) रहते हैं। tender offer में अपने शेयर टेंडर करने की छूट उन्हें फिर भी है।
Tender offer में तारीखों का हिसाब
Record date का ऐलान public announcement में होता है, और उस दिन शेयर आपके demat खाते में होने चाहिए। सौदे T+1 में settle होते हैं, यानी अगले कारोबारी दिन demat में आते हैं। इसलिए आम तौर पर record date से पहले वाले कारोबारी दिन तक खरीदे शेयर ही गिने जाते हैं।
Record date के 2 working days के अंदर कंपनी letter of offer (ऑफर की पूरी शर्तों वाला दस्तावेज) इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भेजती है, और 4 working days के अंदर ऑफर खुल जाता है। letter न मिले, तब भी योग्य शेयरधारक हिस्सा ले सकता है।
शेयर ब्रोकर के जरिये, stock exchange की व्यवस्था से टेंडर होते हैं; तरीका अपने ब्रोकर से पूछ लीजिए।
ऑफर बंद होने के 5 working days के अंदर कंपनी को स्वीकार हुए शेयरों का पैसा देना और बाकी शेयर लौटाने होते हैं। लौटे शेयरों की कीमत उस दिन के बाजार भाव से तय होती है, बायबैक के भाव से नहीं।
एक काल्पनिक उदाहरण: entitlement, 15% कोटा और acceptance
एक काल्पनिक कंपनी tender offer से 10 लाख शेयर खरीदना चाहती है। नियम में इसका 15%, या छोटे शेयरधारकों की हिस्सेदारी के हिसाब से बनने वाला हिस्सा, जो ज्यादा हो, small shareholder (छोटे शेयरधारक) के लिए आरक्षित है। मान लीजिए 15% ज्यादा है: 1.5 लाख शेयर उनके, 8.5 लाख general category (बाकी सब) के।
Small shareholder वह है जिसके पास record date पर उस कंपनी के शेयरों की कीमत ₹2 लाख से ज्यादा न हो। कीमत उस एक्सचेंज के बंद भाव से गिनी जाती है जहां उस शेयर में सबसे ज्यादा कारोबार हुआ। एक ही PAN वाले demat खातों की होल्डिंग जोड़कर गिनी जाती है।
मान लीजिए record date पर छोटे शेयरधारकों के पास कुल 15 लाख शेयर थे और बाकी सबके पास 1.7 करोड़। तो छोटे शेयरधारकों का entitlement ratio (कितने शेयर पक्के तौर पर लिए जाएंगे) हुआ 1.5 लाख ÷ 15 लाख, यानी हर 10 में 1। बाकी सबका हर 20 में 1।
आपके पास 100 शेयर हैं और आप small shareholder हैं, तो आपका entitlement 10 शेयर है, पर आप सारे 100 टेंडर कर सकते हैं। पहले सबके entitlement तक के शेयर लिए जाते हैं। जो टेंडर नहीं करते, उनका बचा हिस्सा उसी category में ज्यादा देने वालों में अनुपात से बंटता है; फिर भी बचे, तो दूसरी category के ज्यादा देने वालों से लिया जाता है।
मान लीजिए आखिर में आपके 25 शेयर लिए गए। बोलचाल में इसे acceptance ratio कहते हैं: 100 में 25, यानी 25%। बाकी 75 शेयर demat में लौट आएंगे। यह अनुपात ऑफर बंद होने के बाद ही पता चलता है।
टैक्स: 1 अप्रैल 2026 से फिर capital gains
1 अक्टूबर 2024 से पहले के कुछ सालों तक लिस्टेड कंपनी के बायबैक पर टैक्स कंपनी भरती थी, और शेयरधारक को मिली रकम पर अलग टैक्स नहीं लगता था।
1 अक्टूबर 2024 से 31 मार्च 2026 तक बायबैक में मिली पूरी रकम शेयरधारक की dividend आय मानी गई, और उस पर उसकी income tax slab (आमदनी के हिसाब से तय दर) से टैक्स लगा। शेयरों की खरीद कीमत अलग से capital loss (पूंजी का नुकसान) मानी गई, जिसे बाद के capital gains (शेयर जैसी संपत्ति बेचने पर हुआ मुनाफा) में से घटाया जा सकता था।
Finance Act, 2026 ने नए Income-tax Act, 2025 में यह नियम 1 अप्रैल 2026 से फिर बदल दिया। अब बायबैक की रकम capital gains में गिनी जाती है, यानी टैक्स सिर्फ मुनाफे पर: बायबैक के भाव में से आपकी खरीद कीमत घटाकर जो बचे। 12 महीने वाली लकीर और short-term, long-term का हिसाब शेयर टैक्स वाले लेख में है।
प्रमोटर के लिए अलग नियम है। उन्हें इस मुनाफे पर additional income-tax (अतिरिक्त टैक्स) भी देना होता है। 1 फरवरी 2026 के बजट के कागजों के मुताबिक इससे कुल असर उस प्रमोटर के लिए 22% बैठता है जो खुद एक भारतीय कंपनी (domestic company) है, और बाकी प्रमोटरों के लिए 30%। वजह यह बताई गई कि प्रमोटर टैक्स के इस फर्क का गलत फायदा न उठाएं।
यह आम जानकारी है, टैक्स की सलाह नहीं; अपने मामले में chartered accountant (CA) से पूछिए।
शेयर घटे, तो EPS का क्या होता है
EPS (earnings per share, प्रति शेयर कमाई) यानी कंपनी का सालाना मुनाफा ÷ शेयरों की गिनती। बायबैक से शेयर घटते हैं, इसलिए मुनाफा वही रहे तो EPS बढ़ जाता है।
मान लीजिए एक काल्पनिक कंपनी का मुनाफा ₹100 करोड़ है और उसके 10 करोड़ शेयर हैं, तो EPS ₹10 हुआ। बायबैक के बाद 9 करोड़ शेयर बचे और मुनाफा उतना ही रहा, तो EPS करीब ₹11.1। कारोबार एक रुपया नहीं बढ़ा, बस बांटने वाले टुकड़े कम हुए।
ऊपर से कंपनी का नकद बाहर गया, तो उस नकद पर मिलने वाला ब्याज भी गया। इसलिए आगे मुनाफा थोड़ा घट भी सकता है। EPS के इस बदलाव का P/E पर असर P/E वाले लेख में है।
सबसे बड़ी गलतफहमी: बायबैक का भाव ऊंचा है, तो मुनाफा पक्का
मान लीजिए tender offer का भाव आज के बाजार भाव से ऊपर है। लोग सोचते हैं: शेयर खरीदो, टेंडर करो, फर्क जेब में। यह सोच अधूरी है।
पहली वजह, कंपनी सारे शेयर नहीं लेती, और कितने लेगी, यह ऑफर बंद होने के बाद ही पता चलता है। दूसरी, जो शेयर लौटते हैं, उनकी कीमत उस दिन के बाजार भाव से तय होती है, जो ऑफर के बाद कहीं भी हो सकता है। ऊपर के उदाहरण में 100 में से 25 गए और 75 लौटे। तीसरी, टैक्स और brokerage जैसे खर्च।
दूसरी गलतफहमी: बायबैक आया है, मतलब कंपनी अच्छी है और भाव बढ़ेगा। बायबैक सिर्फ इतना बताता है कि कंपनी जमा पैसे का एक हिस्सा लौटा रही है। कारोबार कैसा है, यह अलग से देखना पड़ता है, और ऐलान के बाद भाव किस तरफ जाएगा, इसका कोई नियम नहीं।
Tejii यह नहीं बताता कि किसी बायबैक में शेयर टेंडर करें या नहीं, या बायबैक की खबर देखकर शेयर खरीदें या बेचें। किसी एक व्यक्ति के लिए ऐसी राय देना SEBI के यहां registered निवेश सलाहकार का काम है।
Tejii पर इससे जुड़ी चीजें
Tejii बायबैक का कोई डेटा नहीं रखता: न ऑफर का भाव, न record date, न entitlement ratio। ये कंपनी की public announcement और letter of offer में होते हैं। public announcement NSE और BSE की वेबसाइट पर कंपनी की घोषणाओं में मिलती है।
Nifty 500 के हर शेयर के पेज पर पिछला बंद भाव, 1 हफ्ते से 1 साल तक की चाल, 52 हफ्ते की रेंज, 20, 50 और 200 दिन के औसत और एक साल की सबसे बड़ी गिरावट दिखती है। ये आंकड़े split और bonus के हिसाब से ठीक किए जाते हैं, बायबैक के हिसाब से नहीं; ऑफर के दिनों की चाल वहां वैसी ही दिखती है।
खबरें वाले पेज पर बाजार की सुर्खियां उनके स्रोत के साथ आती हैं, जिनमें किसी कंपनी के बायबैक के ऐलान की खबर भी हो सकती है। पूरी शर्तें कंपनी के अपने दस्तावेज में ही पढ़िए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कंपनी अपने ही शेयर वापस क्यों खरीदती है?
आम तौर पर जमा मुनाफे का कुछ हिस्सा शेयरधारकों को लौटाने के लिए। डिविडेंड हर शेयर पर मिलता है, जबकि बायबैक में पैसा सिर्फ उसे मिलता है जो शेयर दे। खरीदे गए शेयर रद्द होते हैं, इसलिए कुल शेयर घटते हैं और जो नहीं बेचता, कंपनी में उसका हिस्सा थोड़ा बढ़ जाता है। बायबैक से यह तय नहीं होता कि कंपनी अच्छी है।
टेंडर ऑफर और ओपन मार्केट बायबैक में क्या फर्क है?
Tender offer में कंपनी तय भाव और record date बताती है, और उस दिन के शेयरधारक 5 working days में शेयर टेंडर करते हैं। Open market में कंपनी तय अवधि में stock exchange से बाजार भाव पर, एक अधिकतम भाव तक खरीदती है, और प्रमोटर इसमें नहीं बेच सकते। यह रास्ता 1 अप्रैल 2025 से बंद था और 1 अगस्त 2026 से फिर खुला है।
बायबैक में record date क्या होती है, और किस दिन तक खरीदे शेयर गिने जाते हैं?
Tender offer में वही शेयरधारक योग्य हैं जिनके demat खाते में record date के दिन शेयर हों। सौदे T+1 में settle होते हैं, इसलिए आम तौर पर record date से पहले वाले कारोबारी दिन तक खरीदे शेयर ही गिने जाते हैं। record date के दिन खरीदा शेयर अगले दिन demat में आता है, इसलिए वह नहीं गिना जाता।
बायबैक में छोटा शेयरधारक (small shareholder) किसे कहते हैं?
जिसके पास record date पर उस कंपनी के शेयरों की कीमत ₹2 लाख से ज्यादा न हो। कीमत उस एक्सचेंज के बंद भाव से गिनी जाती है जहां उस शेयर में सबसे ज्यादा कारोबार हुआ, और एक ही PAN वाले demat खातों की होल्डिंग जोड़ी जाती है। tender offer का 15% इनके लिए आरक्षित होता है, या इनकी हिस्सेदारी के हिसाब से बनने वाला हिस्सा, जो ज्यादा हो।
बायबैक में entitlement ratio और acceptance ratio क्या होते हैं?
Entitlement ratio बताता है कि record date की होल्डिंग पर आपके कितने शेयर पक्के तौर पर लिए जाएंगे, जैसे हर 10 में 1। यह letter of offer में लिखा होता है। Acceptance ratio बोलचाल का शब्द है: आपने जितने शेयर टेंडर किए, उनमें से असल में कितने लिए गए। यह ऑफर बंद होने के बाद पता चलता है, क्योंकि यह बाकी लोगों के टेंडर पर टिका है।
2026 में बायबैक पर टैक्स कैसे लगता है?
Finance Act, 2026 के तहत 1 अप्रैल 2026 से बायबैक की रकम capital gains में गिनी जाती है, यानी टैक्स सिर्फ मुनाफे पर: बायबैक के भाव में से खरीद कीमत घटाकर। 1 अक्टूबर 2024 से 31 मार्च 2026 तक पूरी रकम dividend मानकर slab दर से टैक्स लगता था। प्रमोटर पर अतिरिक्त टैक्स है, जिससे कुल असर 22% या 30% बैठता है। अपने मामले में CA से पूछिए।
क्या टेंडर किए सारे शेयर कंपनी खरीद लेती है?
जरूरी नहीं। पहले हर शेयरधारक के entitlement तक के शेयर लिए जाते हैं। जो लोग टेंडर नहीं करते, उनका बचा हिस्सा ज्यादा शेयर देने वालों में अनुपात से बंटता है। ऑफर बंद होने के 5 working days के अंदर कंपनी को लिए गए शेयरों का पैसा देना होता है, और बाकी शेयर demat में लौट आते हैं। उनकी कीमत तब बाजार भाव से तय होती है।
बायबैक से शेयर के भाव पर क्या असर होता है?
इसका कोई तय नियम नहीं है। शेयरों की गिनती घटती है, इसलिए मुनाफा वही रहे तो EPS (प्रति शेयर कमाई) बढ़ता है, पर कंपनी का नकद भी बाहर जाता है। ऐलान के बाद या ऑफर बंद होने के बाद भाव किसी भी तरफ जा सकता है। Tejii यह नहीं बताता कि बायबैक के बाद कोई शेयर चढ़ेगा या गिरेगा।