बुल और बियर मार्केट क्या है — 10% और 20% की लकीर, जो सिर्फ पीछे का हाल बताती है
बुल और बियर मार्केट क्या है: शिखर से 20% गिरावट को bear, 10-20% को correction कहने का चलन, Nifty 50 के पुराने दौर, और यह लेबल आगे का कुछ क्यों नहीं बताता।
एक लाइन में
Bull market (बुल मार्केट, तेजी का दौर) वह समय है जब शेयर बाजार लंबे वक्त तक चढ़ता रहता है। Bear market (बियर मार्केट, मंदी का दौर) इसका उल्टा है: वह दौर जब बाजार अपने पिछले शिखर से काफी नीचे फिसल जाता है।
काफी यानी कितना? चलन वाला पैमाना यह है कि किसी index (इंडेक्स, जैसे Nifty 50) का बंद भाव अपने पिछले शिखर से 20% या ज्यादा नीचे आ जाए, तो bear market। 10% से 20% के बीच की गिरावट को correction (करेक्शन, बीच के दर्जे की गिरावट) कहते हैं।
ये 10% और 20% कोई NSE या SEBI का नियम नहीं हैं। कोई एक्सचेंज bear market का ऐलान नहीं करता। यह बीते आंकड़ों पर लगाया गया एक लेबल है, और यह आगे के बारे में कुछ नहीं कहता।
सांड और भालू — नाम कहां से आए, और bullish-bearish का मतलब
इन नामों की शुरुआत को लेकर कोई एक राय नहीं है। सबसे ज्यादा सुनी जाने वाली बात जानवरों के वार करने के ढंग से जुड़ी है: सांड (bull) सींग नीचे से ऊपर की ओर मारता है, भालू (bear) पंजा ऊपर से नीचे की ओर। इसलिए चढ़ते बाजार को सांड से और गिरते बाजार को भालू से जोड़ा गया।
इन्हीं से दो शब्द बने जो आप रोज सुनेंगे। Bullish (बुलिश) होने का मतलब है यह मानना कि भाव चढ़ेंगे, और bearish (बियरिश) होने का मतलब यह मानना कि भाव गिरेंगे। फर्क पकड़िए: bullish या bearish किसी की राय है, जबकि bull या bear market बीते आंकड़ों का नाम।
हिंदी में इन्हें तेजी और मंदी भी कहते हैं। बस यह याद रखिए कि यहां मंदी का मतलब शेयरों के भाव गिरना है। देश की अर्थव्यवस्था वाली मंदी (recession) अलग चीज है, और दोनों का साथ आना जरूरी नहीं।
10% और 20% — correction और bear market की लकीर
NISM (National Institute of Securities Markets, SEBI का बनाया शिक्षा संस्थान) के 16 जुलाई 2026 के एक लेख में यही पैमाना लिखा है: index का बंद भाव अपने पिछले शिखर से कम से कम 20% गिरे तो bear market, और 10% से 19.9% की गिरावट correction।
उसी लेख के मुताबिक नया bull market तब शुरू माना जाता है जब बंद भाव अपने तल (trough, गिरावट का सबसे निचला बिंदु) से 20% चढ़ जाए। हिसाब closing price (दिन का बंद भाव) से होता है, दिन के बीच के ऊंचे-नीचे भाव से नहीं।
दो बातें अक्सर छूट जाती हैं। गिनती पिछले शिखर से होती है, उस भाव से नहीं जिस पर आपने खरीदा था। और 10% से छोटी गिरावट का कोई तय नाम नहीं है; उसे लोग dip या pullback (छोटी गिरावट) कह देते हैं।
यही पैमाना किसी एक शेयर पर भी लगाया जाता है। कोई शेयर अपने शिखर से 20% नीचे हो तो लोग कहते हैं कि वह bear territory (मंदी के दायरे) में है, भले उसी दिन Nifty 50 अपने शिखर के पास हो।
एक काल्पनिक उदाहरण: 10,000 से 7,000 और वापसी
मान लीजिए एक काल्पनिक index अपने सबसे ऊंचे स्तर 10,000 पर बंद हुआ। वहां से 9,500 पर बंद हो तो 5% नीचे; इसे कोई खास नाम नहीं मिलता। 9,000 पर बंद हो तो 10% नीचे, यानी correction।
8,000 पर बंद हो तो ठीक 20% नीचे, और इस पैमाने पर अब यह bear market है। गिनती अब भी 10,000 वाले शिखर से ही होगी। मान लीजिए यह 7,000 तक जाकर लौटा, तो गिरावट 30% रही और 7,000 इस दौर का तल हुआ। पर 7,000 तल था, यह तभी पता चलता है जब भाव वहां से ऊपर आ चुके हों।
अब वापसी का हिसाब। 7,000 से 10,000 तक लौटने के लिए index को करीब 43% चढ़ना होगा, 30% नहीं, क्योंकि प्रतिशत अब छोटे आधार से गिना जाता है। 8,000 से लौटने के लिए भी 25% चाहिए। गिरावट जितनी गहरी, वापसी के लिए चढ़ाई उतनी बड़ी।
और अगर index 7,000 से चढ़कर 8,400 पर बंद हो? तल से यह 20% ऊपर है, तो NISM वाले पैमाने पर नया bull market शुरू माना जाएगा, जबकि index अब भी पुराने शिखर से 16% नीचे है। दोनों बातें एक साथ सच हैं, इसलिए सिर्फ शब्द सुनकर तस्वीर न बनाइए।
Nifty 50 में पहले के bear market
NISM के उसी लेख में पिछले करीब 30 साल में Nifty 50 की आठ बड़ी गिरावटें गिनाई गई हैं। पहली चार: 1996-98 का एशियाई संकट (करीब 40%), 2000-01 का dot-com संकट (करीब 53%), 2004 का चुनाव वाला झटका (करीब 36%) और 2006 की गिरावट (करीब 31%)।
बाद की चार: 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट (करीब 60%), 2010-11 का यूरोप का कर्ज संकट (करीब 28%), 2015-16 का कमोडिटी संकट (करीब 24%) और 2020 का कोविड (करीब 40%)। NISM की गिनती में इन आठों की औसत गिरावट करीब 39% रही।
उसी सूची में शिखर से तल तक पहुंचने में 2006 में 34 दिन लगे और 1996-98 में 996 दिन। तल से पुराने शिखर तक लौटने में 138 से 773 दिन लगे। NSE के पुराने आंकड़ों की तारीखों से मिलाएं तो ये कैलेंडर के दिन निकलते हैं, सिर्फ कारोबारी दिन नहीं। मतलब औसत से कोई तय समय नहीं निकलता; हर दौर की लंबाई अलग थी।
इस सूची के कुछ स्तर दिन के बीच के भाव हैं, बंद भाव नहीं; जैसे 2020 के 12,430 और 7,511। इसलिए 2020 को NSE की रोज की index फाइलों से बंद भाव पर देखिए। 14 जनवरी 2020 को Nifty 50 का बंद भाव 12,362.30 था और 23 मार्च 2020 को 7,610.25, यानी 69 दिन में करीब 38% की गिरावट।
फिर 9 नवंबर 2020 को यह 12,461.05 पर बंद हुआ, जो 14 जनवरी वाले शिखर से ऊपर था। तल से वहां तक करीब साढ़े सात महीने लगे। NISM की गिनती में 2008 वाली गिरावट के बाद तल से पुराने शिखर तक लौटने में 739 दिन, यानी दो साल से ज्यादा लगे थे।
अभी Nifty 50 कहां है — 29 सितंबर 2026 तक का हिसाब
NSE की रोज की index फाइलों से गिनें तो पिछले 52 हफ्तों में Nifty 50 का सबसे ऊंचा बंद भाव 26,328.55 रहा, 2 जनवरी 2026 को। 29 सितंबर 2026 को यह 22,716.20 पर बंद हुआ, यानी उस शिखर से करीब 13.7% नीचे।
इस बीच सबसे नीचा बंद भाव 30 मार्च 2026 को 22,331.40 था, शिखर से करीब 15.2% नीचे। यानी 2 जनवरी के शिखर के बाद की यह गिरावट 10-20% वाले पैमाने पर correction के खाने में है, और बंद भाव के हिसाब से 20% की लकीर तक नहीं पहुंची।
यह बीते आंकड़ों का लेबल भर है। Tejii यह नहीं बताता कि Nifty आगे 20% की लकीर पार करेगा या शिखर की ओर लौटेगा, और न यह कि ऐसे वक्त में खरीदें, बेचें या रुके रहें। यह कोई भी पक्का नहीं बता सकता।
एक बात और: Nifty 50 सिर्फ 50 बड़ी कंपनियों का index है। जिस दौर में यह correction में हो, उसी में कई शेयर अपने शिखर से 20% से ज्यादा नीचे हो सकते हैं, और कुछ अपने शिखर के पास भी।
सबसे बड़ी गलतफहमी: 20% गिर गया, तो तल आ गया
आम सोच है कि 20% गिरते ही bear market आ गया, तो अब तल भी आ ही गया होगा। यह गलत है। 20% वह जगह है जहां यह लेबल शुरू होता है, वह नहीं जहां गिरावट रुकती है। NISM की सूची में 2008 की गिरावट करीब 60% तक गई थी।
उल्टी सोच भी उतनी ही गलत है कि correction आया है तो bear market आना तय है। हर bear market पहले correction से गुजरता है, पर हर correction bear market नहीं बनता।
एक बीता किस्सा: 26 सितंबर 2024 को Nifty 50 का बंद भाव 26,216.05 था। उसके बाद सबसे नीचा बंद भाव 4 मार्च 2025 को 22,082.65 रहा, करीब 15.8% नीचे, और 2 जनवरी 2026 को यह फिर उस शिखर के ऊपर बंद हुआ। उस वक्त किसी को नहीं पता था कि गिरावट कहां रुकेगी, और यह बीता किस्सा आगे का पैमाना भी नहीं है।
20% सुनकर कुछ लोग पूरे बाजार वाले circuit breaker (सर्किट ब्रेकर, पूरे बाजार का कारोबार रोकने वाला ब्रेक) को भी इससे जोड़ देते हैं। वह अलग चीज है: NSE उसकी 10%, 15% और 20% की हदें हर दिन पिछले दिन के बंद भाव से गिनता है, यानी वह एक ही दिन की चाल पर लगता है। Bear market वाली 20% की गिरावट शिखर से गिनी जाती है और आम तौर पर हफ्तों या महीनों में आती है।
Tejii यह नहीं बताता कि bear market कब खत्म होगा, तल कहां है, या correction में क्या करना चाहिए। आपकी अपनी हालत देखकर ऐसी सलाह देना SEBI के यहां registered निवेश सलाहकार (investment adviser) का काम है।
Tejii पर इससे जुड़ी चीजें
ऊपर का Nifty 50 वाला हिसाब इस लेख के लिए NSE की रोज की index फाइलों से अलग से किया गया है। Tejii Nifty 50 का शिखर से दूरी वाला आंकड़ा रोज नहीं छापता।
Nifty 500 के हर शेयर के पन्ने पर उसका 52 हफ्ते का हाई-लो है, और यह भी कि पिछला बंद भाव उस हाई से कितने प्रतिशत नीचे है। यह हाई दिन के बीच के सबसे ऊंचे भाव से लिया जाता है, इसलिए ऊपर वाली बंद भाव वाली परिभाषा से थोड़ा अलग आ सकता है।
उद्योग वाले पन्नों पर यही 'हाई से' आंकड़ा उस उद्योग के Nifty 500 वाले सारे शेयरों के लिए एक टेबल में है, साथ में हर शेयर की पिछले एक साल की सबसे बड़ी गिरावट।
गिरावट डेटा वाला पन्ना बताता है कि Nifty 500 के शेयर पिछले करीब एक साल में, उस दिन तक के अपने सबसे ऊंचे बंद भाव से, ज्यादा से ज्यादा कितना गिरे: कितने प्रतिशत शेयर 20% से ज्यादा गिरे, किस उद्योग में आम गिरावट कितनी रही, और सबसे गहरी 25 गिरावटें कौन सी थीं।
Practice पन्ने के नुकसान कैलकुलेटर में रकम डालकर देखिए कि 10%, 20% या 2020 जैसी 38% गिरावट में वह कितनी रह जाती है। ये सब बीते आंकड़े या सीधा हिसाब हैं, आगे का अंदाजा नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बुल मार्केट और बियर मार्केट क्या होता है?
Bull market वह दौर है जब शेयर बाजार लंबे समय तक चढ़ता रहे, और bear market वह जब बाजार अपने पिछले शिखर से काफी नीचे आ जाए। चलन वाले पैमाने में index का बंद भाव पिछले शिखर से 20% या ज्यादा नीचे हो तो bear market कहते हैं। यह NSE या SEBI का नियम नहीं, बाजार का चलन है।
बुल (सांड) और बियर (भालू) नाम क्यों पड़ा?
इन नामों की शुरुआत को लेकर कोई एक राय नहीं है। सबसे ज्यादा सुनी जाने वाली बात यह है कि सांड सींग नीचे से ऊपर मारता है और भालू पंजा ऊपर से नीचे। इसी से चढ़ते बाजार को bull और गिरते बाजार को bear कहा जाने लगा। हिंदी में इन्हें तेजी और मंदी का दौर भी कहते हैं।
मार्केट करेक्शन क्या होता है?
जब index का बंद भाव अपने पिछले शिखर से 10% से 20% के बीच नीचे आ जाए, तो उसे correction कहते हैं। NISM के एक लेख में यही 10% से 19.9% का पैमाना लिखा है। Correction किसी एक्सचेंज का ऐलान नहीं है, और यह नहीं बताता कि गिरावट यहीं रुकेगी या आगे बढ़ेगी।
करेक्शन और बियर मार्केट में क्या फर्क है — कितनी गिरावट पर?
फर्क सिर्फ गिरावट की गहराई का है। शिखर से 10% से 20% के बीच की गिरावट correction, और 20% या ज्यादा bear market। दोनों बंद भाव से और पिछले शिखर से गिने जाते हैं। मान लीजिए शिखर 10,000 का है, तो 9,000 पर correction और 8,000 पर bear market शुरू।
निफ्टी में पहले बियर मार्केट कब आए और कितने दिन में संभले?
NISM ने पिछले करीब 30 साल में Nifty 50 की आठ बड़ी गिरावटें गिनाई हैं; सबसे गहरी 2008 वाली थी, करीब 60%। उसकी गिनती में तल से पुराने शिखर तक लौटने में 138 से 773 दिन लगे। NSE के बंद भाव से देखें तो 2020 में Nifty 14 जनवरी से 23 मार्च तक करीब 38% गिरा और 9 नवंबर 2020 को उस शिखर के ऊपर बंद हुआ।
क्या अभी बाजार में बियर मार्केट है?
NSE के आंकड़ों से, 29 सितंबर 2026 को Nifty 50 22,716.20 पर बंद हुआ, जो 2 जनवरी 2026 के 26,328.55 वाले शिखर से करीब 13.7% नीचे है। 10-20% वाले पैमाने पर यह correction है, bear market नहीं। यह सिर्फ बीते आंकड़ों का लेबल है; Tejii यह नहीं बताता कि आगे क्या होगा।
bullish और bearish का मतलब क्या है?
Bullish यानी किसी को लगता है कि भाव चढ़ेंगे, bearish यानी किसी को लगता है कि गिरेंगे। ये शब्द किसी की राय बताते हैं, जबकि bull या bear market बीते आंकड़ों का नाम है। किसी का bullish या bearish होना इस बात का सबूत नहीं कि भाव सच में उसी तरफ जाएंगे।
बियर मार्केट कब खत्म होता है?
NISM के लेख वाले पैमाने में नया bull market तब शुरू माना जाता है जब बंद भाव अपने तल से 20% चढ़ जाए। पर तल कौन सा था, यह बाद में ही पता चलता है। Tejii यह नहीं बताता कि कोई bear market कब खत्म होगा; यह कोई पक्का नहीं बता सकता।