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FII और DII क्या हैं — और रोज शाम आने वाले इनके आंकड़े क्या बताते हैं?

FII यानी विदेशी और DII यानी भारतीय बड़े संस्थान। NSE हर कारोबारी शाम इनकी खरीद-बिक्री का आंकड़ा देता है — उसे पढ़ने का सही तरीका, आसान हिंदी में।

प्रकाशित 2026-09-05 · अपडेट 2026-09-22 · ⏱ 6 मिनट

सीधा जवाब

FII यानी Foreign Institutional Investors — विदेश के बड़े फंड, जो भारतीय शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। DII यानी Domestic Institutional Investors — भारत के बड़े संस्थान, जैसे म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां, बैंक और पेंशन फंड। हर कारोबारी दिन की शाम NSE बताता है कि इन दोनों ने उस दिन कितने रुपये के शेयर खरीदे और कितने के बेचे।

2014 में SEBI ने FII और दो पुरानी विदेशी श्रेणियों (sub-account और QFI) को मिलाकर एक नई श्रेणी बनाई — FPI, यानी Foreign Portfolio Investor। कानूनी शब्द आज FPI है, पर बोलचाल में FII ही चलता है, और NSE भी अपनी रिपोर्ट का नाम FII/FPI & DII trading activity रखता है। इस लेख में FII और FPI एक ही चीज हैं।

यह आंकड़ा सलाह नहीं है, सिर्फ हिसाब है कि उस दिन बड़े संस्थानों के पैसे ने क्या किया। इसे खबर की तरह पढ़िए, इशारे की तरह नहीं।

ये संस्थान असल में कौन हैं

FPI में विदेश के पेंशन फंड, sovereign wealth fund (किसी देश की सरकार का अपना निवेश फंड), दूसरों का पैसा संभालने वाली बड़ी कंपनियां (asset manager), बैंक और बीमा कंपनियां आती हैं। इन्हें भारत में FPI के रूप में रजिस्टर होना पड़ता है। यह रजिस्ट्रेशन SEBI की ओर से Designated Depository Participant (DDP) देते हैं — ये SEBI से मंजूरी पाई हुई संस्थाएं हैं।

नया FPI ढांचा 1 जून 2014 से लागू हुआ और उसने 1995 वाले FII नियमों की जगह ली। फिर 23 सितंबर 2019 को SEBI के FPI Regulations, 2019 आए, जिन्होंने FPI की तीन श्रेणियों को घटाकर दो कर दिया — Category I और Category II।

DII की तरफ मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां (जैसे LIC), बैंक और पेंशन फंड आते हैं। PRIME Database (बाजार के आंकड़े जुटाने वाली एक निजी संस्था) के मुताबिक 30 जून 2026 को NSE पर लिस्टेड कंपनियों में DII की कुल हिस्सेदारी 19.15% थी, जिसमें 11.58% अकेले म्यूचुअल फंड की थी। उसी दिन FII की हिस्सेदारी 15.88% थी, जो PRIME के मुताबिक 14 साल में सबसे कम थी।

आंकड़ा कहां से आता है और कितना पक्का है

NSE यह आंकड़ा हर कारोबारी दिन शाम को अपनी वेबसाइट पर डालता है। रिपोर्ट के नाम में ही लिखा है कि यह NSE, BSE और MSEI — तीनों एक्सचेंज पर हुए कारोबार का जोड़ है। यह सिर्फ cash market का आंकड़ा है, यानी उस हिस्से का जहां असली शेयर खरीदे-बेचे जाते हैं।

NSE खुद लिखता है कि यह आंकड़ा provisional यानी अस्थायी है, और custodian (बड़े निवेशकों के शेयरों का हिसाब रखने वाली संस्था) की पुष्टि जैसी प्रक्रियाओं के बाद बदल सकता है। FPI निवेश का आधिकारिक आंकड़ा depository NSDL अपनी FPI वेबसाइट पर अलग से देता है।

NSDL के FPI आंकड़े में IPO जैसे primary market (जहां कंपनी नए शेयर बेचकर पैसा जुटाती है) में लगाया पैसा भी जुड़ता है, जो एक्सचेंज की रिपोर्ट में नहीं होता। अक्टूबर 2024 में एक्सचेंज की रिपोर्ट में FII की शुद्ध बिकवाली ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा थी, जबकि NSDL में शेयरों से शुद्ध निकासी ₹94,017 करोड़ थी। दोनों सही हैं, बस एक ही चीज नहीं गिन रहे।

derivatives यानी futures और options में FII क्या कर रहे हैं, इसका आंकड़ा NSE अलग से देता है। कई बड़े फंड cash में खरीदे शेयरों को derivatives में hedge भी करते हैं, यानी उल्टी पोजीशन लेकर नुकसान का खतरा घटाते हैं। इसलिए अकेला cash नंबर पूरी तस्वीर नहीं है।

net नंबर पढ़ने का तरीका

रिपोर्ट में दोनों के तीन-तीन नंबर होते हैं, सब करोड़ रुपये में — gross buy यानी कुल खरीद, gross sell यानी कुल बिक्री, और net यानी दोनों का अंतर। net में + का मतलब है कि खरीद ज्यादा रही, और − का मतलब है कि बिक्री ज्यादा रही।

एक काल्पनिक उदाहरण लीजिए। किसी दिन FII ने ₹12,450 करोड़ के शेयर खरीदे और ₹15,562 करोड़ के बेचे, तो net हुआ −₹3,112 करोड़। उसी दिन DII ने ₹16,930 करोड़ के शेयर खरीदे और ₹8,000 करोड़ के बेचे, तो net हुआ +₹8,930 करोड़। यानी उस दिन घरेलू संस्थानों की शुद्ध खरीद विदेशी संस्थानों की शुद्ध बिकवाली से बड़ी थी।

एक दिन का आंकड़ा बहुत कम बताता है — किसी एक फंड का बड़ा सौदा पूरा नंबर पलट सकता है। ज्यादा काम की चीज कई हफ्तों की चाल है: क्या FII लगातार बेच रहे हैं, क्या DII लगातार खरीद रहे हैं, या दोनों एक ही तरफ हैं। याद रखिए, यह चाल भी सिर्फ बीते समय का हिसाब है।

विदेशी पैसा आता-जाता क्यों है

FPI का पैसा सिर्फ भारत को देखकर नहीं चलता। पहली वजह दुनिया की ब्याज दरें हैं — अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर ब्याज बढ़े, तो कम जोखिम वाला अच्छा रिटर्न वहीं मिलने लगता है और भारत जैसे उभरते बाजारों का आकर्षण घटता है। दूसरी वजह डॉलर है — रुपया कमजोर हो, तो भारतीय शेयर का मुनाफा डॉलर में बदलते समय घट जाता है।

तीसरी वजह तुलना है — कोई दूसरा बाजार बेहतर लगे तो पैसा वहां खिसक सकता है। कभी वजह भारत में होती ही नहीं: विदेश में फंड के अपने निवेशक पैसा वापस मांगते हैं, तो फंड को यहां भी शेयर बेचने पड़ते हैं।

NSDL के आंकड़े देखिए। मार्च 2020 में कोविड की घबराहट में FPI ने शेयरों से ₹61,973 करोड़ और बॉन्ड से ₹56,211 करोड़ निकाले — कुल ₹1.18 लाख करोड़ से ज्यादा, जो तब तक की सबसे बड़ी मासिक निकासी थी। सिर्फ शेयरों से एक महीने की सबसे बड़ी निकासी का रिकॉर्ड अक्टूबर 2024 में बना (₹94,017 करोड़), और मार्च 2026 में वह भी टूट गया, जब करीब ₹1.17 लाख करोड़ निकले। ये इतिहास के आंकड़े हैं, आगे का अंदाजा इनसे नहीं लगता।

DII का पैसा असल में आम लोगों की बचत है

म्यूचुअल फंड के मैनेजर तय करते हैं कि पैसा किन शेयरों में जाए। पर कितना पैसा आएगा, यह काफी हद तक आम लोगों की बचत तय करती है। DII की खरीद का एक बड़ा और नियमित स्रोत SIP है — वह रकम जो हर महीने अपने आप बैंक खाते से कटकर म्यूचुअल फंड में पहुंचती है। बीमा और पेंशन फंड का पैसा भी लोगों की ही बचत है।

AMFI (म्यूचुअल फंड कंपनियों की संस्था) के मुताबिक अगस्त 2026 में SIP से ₹32,297 करोड़ आए, जो उस समय तक का सबसे ऊंचा मासिक आंकड़ा था। उस महीने पैसा डालने वाले SIP खाते 10 करोड़ से ज्यादा थे। महीने के अंत में म्यूचुअल फंड उद्योग की AUM, यानी कुल संभाली जा रही रकम, करीब ₹87 लाख करोड़ थी।

SEBI के नियमों में equity फंड को अपने पैसे का बड़ा हिस्सा शेयरों में रखना होता है। इसलिए SIP का जो पैसा equity फंड में जाता है, उसका ज्यादातर हिस्सा खबर अच्छी हो या बुरी, शेयरों में ही लगता है। तो “DII खरीद रहे हैं” की एक बड़ी वजह अक्सर यही होती है कि हर महीने करोड़ों SIP कटती हैं — जरूरी नहीं कि किसी ने बाजार पर कोई खास राय बनाई हो।

सबसे बड़ी गलतफहमी

सबसे आम गलती है यह सोचना कि FII खरीद रहे हैं तो मैं भी खरीदूं, और FII बेच रहे हैं तो मैं भी निकल जाऊं। यह सोच तीन वजहों से गलत है।

पहली, आप यह नंबर बाजार बंद होने के बाद पढ़ते हैं, और वह भी अस्थायी रूप में — जो सौदे हो चुके, वे बदले नहीं जा सकते। दूसरी, यह सैकड़ों फंडों का जोड़ है। उसी दिन एक फंड खरीदता है, दूसरा बेचता है, और net सिर्फ बचा हुआ अंतर है, किसी एक की राय नहीं।

तीसरी, उनका मकसद, समय और पैसा आपसे अलग है। एक विदेशी फंड किसी शेयर को सालों तक रख सकता है या derivatives में hedge कर सकता है। आपकी जरूरत, समय-सीमा और नुकसान सहने की क्षमता बिल्कुल अलग हो सकती है।

एक और गलत धारणा है कि FII बेचें तो खरीदने वाला कोई नहीं बचता। हर सौदे में एक खरीदार और एक बेचने वाला होता है; कीमत उस स्तर तक खिसकती है जहां खरीदार मिल जाए। अक्टूबर 2024 में जब FII ने एक्सचेंज पर ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा के शेयर शुद्ध रूप से बेचे, उसी महीने DII ने ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा की शुद्ध खरीद की। ये नंबर बताते हैं कि बाजार में क्या हो चुका है, यह नहीं कि आपको क्या करना है।

Tejii पर यह आंकड़ा कहां है

Tejii के होम पेज पर शाम के अपडेट के बाद आखिरी कारोबारी दिन का FII और DII net दिखता है, NSE की उसी अस्थायी रिपोर्ट से। जिस शाम NSE से आंकड़ा नहीं मिलता, उस शाम यह लाइन नहीं दिखती — उसे अंदाजे से नहीं भरा जाता।

FII / DII वाले रोजाना पेज पर वही net आंकड़े हिंदी में हैं, और यह भी कि उस दिन दोनों एक ही दिशा में रहे या उल्टी। Tejii अभी gross खरीद-बिक्री या derivatives का आंकड़ा नहीं दिखाता, और हफ्तों का जोड़ भी एक जगह नहीं दिखाता। हफ्तों और महीनों की FPI चाल के लिए NSDL की FPI रिपोर्ट देखिए।

Tejii सलाह नहीं देता, और यह SEBI में रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट या निवेश सलाहकार नहीं है। पैसा कहां लगाना है, यह तय करने के लिए SEBI में रजिस्टर्ड सलाहकार से बात करें।

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