वॉल्यूम क्या होता है — औसत से 2x, डिलीवरी % और टर्नओवर, और यह दिशा क्यों नहीं बताता
शेयर मार्केट में वॉल्यूम क्या होता है: एक दिन में कितने शेयरों का सौदा हुआ। 100 खरीदे, 100 बेचे तो वॉल्यूम 100 क्यों, औसत से 2x और डिलीवरी % का मतलब।
एक लाइन में
वॉल्यूम (volume) का मतलब है कि एक दिन में किसी कंपनी के कितने शेयरों का सौदा हुआ, यानी कितने शेयर एक हाथ से दूसरे हाथ गए। किसी शेयर का आज का वॉल्यूम 5 लाख है, तो आज उसके 5 लाख शेयर खरीदे गए और ठीक उतने ही बेचे गए।
यह नंबर बस इतना बताता है कि उस दिन उस शेयर में कितना कारोबार हुआ। भाव ऊपर जाएगा या नीचे, कंपनी अच्छी है या नहीं, वॉल्यूम इनमें से कुछ नहीं बताता।
यह लेख नकद बाजार (cash market, जहां शेयर सीधे खरीदे-बेचे जाते हैं) की बात करता है; F&O (फ्यूचर्स और ऑप्शंस) का हिसाब अलग है। Tejii यह नहीं बताता कि कितना वॉल्यूम देखकर कोई शेयर खरीदें या बेचें।
100 खरीदे, 100 बेचे — वॉल्यूम 100 या 200?
जवाब है 100। हर सौदे में एक खरीदार होता है और एक बेचने वाला, और दोनों उन्हीं शेयरों का लेन-देन करते हैं। इसलिए सौदा एक ही बार गिना जाता है। खरीद और बिक्री को जोड़ दें, तो हर शेयर दो बार गिन लिया जाएगा।
NSE हर कारोबारी दिन के बाद हर शेयर के लिए ये आंकड़े अलग-अलग जारी करता है: कुल कितने शेयरों का सौदा हुआ (traded quantity, यही वॉल्यूम है), कुल कितने रुपये का सौदा हुआ (turnover), और कुल कितने सौदे हुए (number of trades)।
सौदों की गिनती और वॉल्यूम एक चीज नहीं हैं। 1,000 शेयर एक ही सौदे में भी बिक सकते हैं और सौ छोटे-छोटे सौदों में भी; वॉल्यूम दोनों बार 1,000 ही रहेगा।
वॉल्यूम और टर्नओवर (कारोबार की रकम) में फर्क
वॉल्यूम शेयरों की गिनती है, turnover (टर्नओवर, यानी कुल कितने रुपये का सौदा हुआ) रुपयों की। हर सौदे के शेयरों को उसके भाव से गुणा करके सब जोड़ दें, तो उस दिन का turnover बनता है।
एक काल्पनिक उदाहरण। कंपनी A का शेयर ₹20 का है और आज उसके 50 लाख शेयरों का सौदा हुआ। कंपनी B का शेयर ₹2,000 का है और आज उसके 50,000 शेयरों का सौदा हुआ। वॉल्यूम में A, B से 100 गुना आगे दिखेगी, पर दोनों का turnover बराबर है: करीब ₹10 करोड़।
इसलिए दो अलग शेयरों को वॉल्यूम से तौलना ठीक नहीं; सस्ते शेयरों का वॉल्यूम अपने आप बड़ा दिखता है। अलग-अलग शेयरों में कितने पैसे का लेन-देन हुआ, यह turnover बेहतर बताता है। वॉल्यूम तब काम का है, जब एक ही शेयर को उसके अपने पुराने दिनों से मिलाना हो।
औसत से 2x का मतलब, और औसत कितने दिन का
एक दिन का वॉल्यूम अकेले ज्यादा कुछ नहीं कहता: 5 लाख किसी शेयर के लिए आम दिन हो सकता है, किसी के लिए बहुत बड़ा। इसलिए आज के वॉल्यूम को उसी शेयर के हाल के औसत वॉल्यूम से भाग देते हैं। इसे relative volume (औसत के मुकाबले वॉल्यूम) कहते हैं। 2x का मतलब है कि आज आम दिनों से दोगुने शेयरों का सौदा हुआ।
औसत कितने दिन का हो, इसका कोई एक नियम नहीं है: कहीं 10 दिन, कहीं 20 या 50, और कहीं आज का दिन औसत में जुड़ा होता है, कहीं नहीं। इसलिए एक ही शेयर का "कितने गुना" अलग-अलग जगह अलग दिख सकता है।
Tejii उस शेयर के पिछले 20 कारोबारी दिनों का सीधा औसत (simple average) लेता है, और उसमें उस दिन को भी गिनता है। एक काल्पनिक उदाहरण: किसी शेयर में 19 दिन रोज 1 लाख शेयरों का सौदा हुआ और आज 10 लाख का। 20 दिन का औसत बना (19 लाख + 10 लाख) ÷ 20 = 1.45 लाख। आज का वॉल्यूम इसका करीब 6.9 गुना है, 10 गुना नहीं, क्योंकि बड़ा दिन खुद औसत को ऊपर खींच लेता है। इसी वजह से Tejii पर यह गुना 20 से ऊपर जा ही नहीं सकता।
split (एक शेयर को कई छोटे शेयरों में बांटना) या bonus (मुफ्त अतिरिक्त शेयर) के बाद शेयरों की गिनती बढ़ जाती है, तो वॉल्यूम भी अपने आप बड़ा दिखता है। मान लीजिए एक शेयर पांच में बंटा: अब बिना किसी खास बात के भी रोज शेयरों की गिनती करीब पांच गुना दिख सकती है।
Tejii ऐसे में पुराने दिनों का वॉल्यूम उसी अनुपात में बढ़ाकर गिनता है, ताकि split के बाद हर दिन "5 गुना" न दिखे। यह तभी होता है जब Tejii का हिसाब split या bonus को पहचान पाए; कुछ छोटे bonus पकड़ में नहीं आते।
डिलीवरी वॉल्यूम और डिलीवरी प्रतिशत
दिन भर में जितने शेयरों का सौदा हुआ, वे सारे किसी के डीमैट खाते में नहीं जाते। कोई सुबह खरीदकर दोपहर में बेच दे (इसे intraday कहते हैं), तो दिन के आखिर में उसके खाते में कुछ नहीं आता-जाता। जो हिस्सा सच में एक खाते से दूसरे खाते में जाता है, उसे deliverable quantity (डिलीवरी वाले शेयर) कहते हैं।
delivery percentage (डिलीवरी प्रतिशत) = डिलीवरी वाले शेयर ÷ कुल वॉल्यूम × 100। NSE हर कारोबारी दिन हर शेयर के लिए यह आंकड़ा जारी करता है। उसकी रिपोर्ट में यह हिसाब हर ग्राहक के स्तर पर होता है: एक ही ग्राहक ने उसी दिन जो खरीदकर बेच दिया, वह डिलीवरी में नहीं गिना जाता।
एक काल्पनिक उदाहरण। किसी शेयर में आज 10 लाख शेयरों का सौदा हुआ। इनमें से 6 लाख का सौदा उन लोगों ने किया जिन्होंने उसी दिन खरीदकर बेच भी दिया, इसलिए दिन के आखिर में उनके खाते जस के तस रहे। बाकी 4 लाख शेयर सच में एक खाते से दूसरे खाते में गए। डिलीवरी प्रतिशत हुआ 40%।
BE series (NSE पर शेयरों की एक अलग श्रेणी) वाले शेयरों के लिए यह आंकड़ा नहीं मिलता: सितंबर 2026 की NSE की रोज की फाइलों में ऐसे शेयरों के आगे डिलीवरी वाले कॉलम खाली (-) थे। ये trade-for-trade (हर सौदे का अलग हिसाब) वाले शेयर हैं। NSE के मुताबिक इनमें हर सौदे का settlement (शेयर और पैसे का असल लेन-देन) अलग होता है और netting (एक दिन की खरीद और बिक्री को आपस में काटना) की इजाजत नहीं है, यानी यहां हर सौदे की डिलीवरी होती ही है।
बल्क डील और ब्लॉक डील — बड़े सौदे कहां दिखते हैं
bulk deal (बल्क डील) तब कहलाती है जब किसी एक ग्राहक ने एक दिन में, आम बाजार में, किसी कंपनी के एक्सचेंज पर listed (दर्ज) कुल शेयरों के 0.5% से ज्यादा खरीदे या बेचे हों, एक सौदे में या कई में।
यह नियम SEBI के 14 जनवरी 2004 के circular (लिखित निर्देश) से चला आ रहा है: एक्सचेंज ऐसे सौदे में शेयर का नाम, ग्राहक का नाम, शेयरों की संख्या और भाव उसी दिन बाजार बंद होने के बाद सबके लिए जारी करता है। ये सौदे आम बाजार में होते हैं, इसलिए उस दिन के वॉल्यूम में जुड़े होते हैं।
block deal (ब्लॉक डील) के लिए अलग खिड़की है। SEBI के 8 अक्टूबर 2025 के circular के मुताबिक यह सुबह 8:45 से 9:00 और दोपहर 2:05 से 2:20 तक खुलती है। एक ऑर्डर कम से कम ₹25 करोड़ का होना चाहिए, भाव एक तय संदर्भ भाव से 3% ऊपर-नीचे के अंदर रहना चाहिए, और हर सौदे की डिलीवरी जरूरी है। ये नियम circular आने के 60वें दिन से लागू हुए। इन सौदों की जानकारी भी उसी दिन बाजार बंद होने के बाद जारी होती है।
NSE की रोज की bhavcopy (सारे शेयरों के भावों की आधिकारिक फाइल) में ब्लॉक डील खिड़की के सौदे BL series की अलग लाइन में आते हैं, आम शेयरों वाली EQ series की लाइन में नहीं। इसलिए ब्लॉक डील वाले दिन एक ही शेयर का वॉल्यूम अलग-अलग जगह अलग दिख सकता है: कहीं ये सौदे जोड़कर, कहीं इनके बिना।
कम वॉल्यूम वाले शेयर में दिक्कत क्या है
जिस शेयर में रोज गिने-चुने शेयरों का सौदा होता है, उसमें एक बड़ा ऑर्डर ही भाव को काफी हिला सकता है। बेचना हो तो सामने खरीदार कम मिलते हैं, और ऑर्डर उस भाव पर पूरा नहीं होता जो स्क्रीन पर दिख रहा था। इसे liquidity (तरलता, यानी कितनी आसानी से खरीद-बेच पाएं) की कमी कहते हैं।
ऐसे शेयर सर्किट पर भी जल्दी अटकते हैं, क्योंकि कुछ ही ऑर्डर भाव को हद तक पहुंचा देते हैं। इसकी पूरी बात पेनी स्टॉक और सर्किट वाले लेखों में है; यहां बस इतना याद रखिए कि कम वॉल्यूम में जरूरत पड़ने पर निकलना मुश्किल हो सकता है।
सबसे बड़ी गलतफहमी: वॉल्यूम बढ़ा, मतलब खरीदारी बढ़ी
सबसे आम सोच यह है कि ज्यादा वॉल्यूम मतलब लोग खरीद रहे हैं। यह गलत है। जितने शेयर खरीदे गए, ठीक उतने ही बेचे गए। 10 लाख के वॉल्यूम का मतलब 10 लाख शेयरों की खरीदारी भी है और 10 लाख की बिकवाली भी। ज्यादा वॉल्यूम वाला दिन तेज गिरावट का भी हो सकता है, तेज चढ़ाई का भी, और लगभग सपाट भी।
दूसरी गलतफहमी: "डिलीवरी प्रतिशत ऊंचा है, मतलब बड़े निवेशक चुपचाप शेयर जमा कर रहे हैं।" डिलीवरी सिर्फ इतना बताती है कि शेयर सच में खाते बदल गए। जिसने शेयर दिए, उसने भी डिलीवरी दी। किसने खरीदा, किसने बेचा और क्यों, यह इस आंकड़े में होता ही नहीं।
वॉल्यूम को एक सवाल की तरह लीजिए: आज इस शेयर में इतना कारोबार क्यों हुआ? जवाब मिले तो कंपनी की घोषणाओं और खबरों में मिलेगा, इस नंबर में नहीं। Tejii यह नहीं बताता कि कितने वॉल्यूम या कितने डिलीवरी प्रतिशत पर कोई शेयर खरीदें, बेचें या रखें। किसी एक व्यक्ति के लिए ऐसी सलाह देना SEBI में registered निवेश सलाहकार का काम है।
Tejii पर इससे जुड़ी चीजें
Nifty 500 के हर शेयर के पन्ने पर "आंकड़े क्या कह रहे हैं" में एक लाइन है कि उस दिन का कारोबार औसत से कितने गुना रहा, ऊपर बताए 20 दिन वाले तरीके से। 20 दिन से कम पुराने शेयर के लिए यह गुना नहीं बनता। 2 गुना या ज्यादा हो तो साथ में लिखा आता है कि उस दिन कुछ खास हुआ था, जैसे खबर, नतीजे या कोई बड़ा सौदा; असल में क्या हुआ, यह पन्ना नहीं बताता।
स्कैनर में "वॉल्यूम, औसत का कितना गुना" वाला filter (छांटने की शर्त) है, और हर शेयर के आगे "वॉल्यूम ×" और करोड़ रुपये में कारोबार के कॉलम। होमपेज पर और रोज की बाजार रिपोर्ट में गिनती आती है कि कितने शेयरों में वॉल्यूम औसत से 2 गुना या ज्यादा रहा। होमपेज के टॉप मूवर्स (Nifty 500 में से) में "सबसे ज्यादा कारोबार" (रुपयों में) और "वॉल्यूम" (शेयरों की गिनती में) के अलग टैब हैं, और इन दोनों की सूची अक्सर अलग निकलती है।
जो Tejii पर नहीं है: डिलीवरी प्रतिशत यहां नहीं दिखता, उसके लिए NSE की रिपोर्ट देखिए। Tejii का वॉल्यूम आम बाजार की EQ और BE series का है, इसलिए ब्लॉक डील खिड़की के सौदे इसमें नहीं जुड़ते। सारे आंकड़े बाजार बंद होने के बाद की NSE bhavcopy से बनते हैं, लाइव नहीं। और किसी सूची में नाम होना खरीदने या बेचने का इशारा नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शेयर मार्केट में वॉल्यूम कैसे गिना जाता है — 100 खरीदे और 100 बेचे तो वॉल्यूम 100 या 200?
100। हर सौदे में एक खरीदार और एक बेचने वाला होता है, और दोनों उन्हीं शेयरों का लेन-देन करते हैं, इसलिए सौदा एक ही बार गिना जाता है। वॉल्यूम यानी उस दिन कितने शेयर एक हाथ से दूसरे हाथ गए। खरीद और बिक्री को जोड़ें, तो हर शेयर दो बार गिना जाएगा।
वॉल्यूम बढ़ने का क्या मतलब है?
बस इतना कि उस दिन उस शेयर में आम दिनों से ज्यादा शेयरों का सौदा हुआ। वजह कंपनी की खबर, नतीजे, कोई बड़ा सौदा या पूरे बाजार की हलचल हो सकती है। वॉल्यूम दिशा नहीं बताता: जितने शेयर खरीदे गए, उतने ही बेचे गए। ज्यादा वॉल्यूम वाला दिन गिरावट का भी हो सकता है और चढ़ाई का भी।
औसत से 2x वॉल्यूम का क्या मतलब है, और औसत कितने दिन का लिया जाता है?
2x का मतलब है कि आज उस शेयर में उसके हाल के औसत से दोगुने शेयरों का सौदा हुआ। औसत का कोई एक तय नियम नहीं है; अलग-अलग जगह 10, 20 या 50 दिन हो सकते हैं। Tejii पिछले 20 कारोबारी दिनों का सीधा औसत लेता है, उस दिन को मिलाकर, इसलिए इसका गुना दूसरी जगहों से थोड़ा अलग दिख सकता है।
डिलीवरी प्रतिशत क्या होता है और कहां देखें?
दिन के कुल वॉल्यूम में से कितने प्रतिशत शेयर सच में एक डीमैट खाते से दूसरे में गए। जो ग्राहक उसी दिन खरीदकर बेच दे, उसका हिस्सा इसमें नहीं गिना जाता। NSE हर कारोबारी दिन हर शेयर के लिए यह आंकड़ा अपनी वेबसाइट पर जारी करता है। Tejii पर यह आंकड़ा नहीं दिखता।
वॉल्यूम और टर्नओवर में क्या फर्क है?
वॉल्यूम शेयरों की गिनती है, टर्नओवर रुपयों में कुल सौदा। ₹20 वाले शेयर के 50 लाख शेयर और ₹2,000 वाले शेयर के 50,000 शेयर, दोनों का टर्नओवर करीब ₹10 करोड़ है, पर वॉल्यूम 100 गुना अलग। अलग-अलग शेयरों की तुलना टर्नओवर से ठीक रहती है, और एक ही शेयर की उसके पुराने दिनों से तुलना वॉल्यूम से।
कम वॉल्यूम वाले शेयर में क्या जोखिम है?
ऐसे शेयर में खरीदार और बेचने वाले कम होते हैं, इसलिए एक बड़ा ऑर्डर भी भाव को काफी हिला सकता है। बेचना चाहें तो ऑर्डर स्क्रीन वाले भाव पर पूरा न हो, या देर तक पड़ा रहे। कुछ ही ऑर्डर भाव को सर्किट तक पहुंचा सकते हैं, और लोअर सर्किट पर अटके शेयर में अक्सर खरीदार होता ही नहीं। इसे liquidity (तरलता) की कमी कहते हैं।
बल्क डील और ब्लॉक डील क्या होती है?
बल्क डील: किसी एक ग्राहक ने एक दिन में आम बाजार में किसी कंपनी के listed शेयरों के 0.5% से ज्यादा खरीदे या बेचे। ब्लॉक डील: अलग खिड़की (सुबह 8:45 से 9:00, दोपहर 2:05 से 2:20) में कम से कम ₹25 करोड़ का सौदा, जिसकी डिलीवरी जरूरी है। दोनों की जानकारी एक्सचेंज उसी दिन बाजार बंद होने के बाद जारी करते हैं।
BE (T2T) शेयरों में इंट्राडे क्यों नहीं होता, और इनका डिलीवरी प्रतिशत क्यों नहीं दिखता?
BE series वाले शेयर trade-for-trade (T2T) व्यवस्था में होते हैं। NSE के मुताबिक यहां हर सौदे का settlement अलग होता है और netting की इजाजत नहीं, यानी एक दिन की खरीद और बिक्री आपस में नहीं कटती। इसलिए उसी दिन खरीदकर बेचने से सौदा बराबर नहीं होता; हर सौदे की डिलीवरी होती है। सितंबर 2026 की NSE की रोज की फाइलों में इनके डिलीवरी वाले कॉलम खाली (-) थे।