टेक्सटाइल सेक्टर के शेयर: धागा, कपड़ा, इनरवियर और होम टेक्सटाइल कंपनियां
निफ्टी 500 के 5 शेयर · 14 अक्टूबर 2026 के बंद भाव
NSE की "Textiles" श्रेणी में वे कंपनियां आती हैं जो रुई (कपास) से धागा, धागे से कपड़ा और कपड़े से तैयार सामान बनाती हैं। Nifty 500 में शामिल इस श्रेणी की पांच कंपनियों का कारोबार आपस में काफी अलग है, जो नाम से पता नहीं चलता। K.P.R. Mill कोयंबटूर (तमिलनाडु) की कंपनी है, जो सूती धागा, बुना हुआ कपड़ा (knitted fabric) और उससे तैयार कपड़े बनाती है और बड़ा हिस्सा विदेश भेजती है; इसके पास चीनी और एथेनॉल के कारखाने तथा FASO नाम का इनरवियर ब्रांड भी है। Page Industries अमेरिकी कंपनी Jockey International की एक्सक्लूसिव लाइसेंसधारी है, यानी भारत समेत तय देशों में Jockey ब्रांड के अंडरगारमेंट, लाउंजवियर और मोजे बनाने और बेचने का अधिकार सिर्फ इसके पास है, और इसके कारखाने ज्यादातर कर्नाटक में हैं। Trident बरनाला (पंजाब) और बुधनी (मध्य प्रदेश) में तौलिए, बेडशीट और धागा बनाती है, और गेहूं के भूसे से कागज भी बनाती है। Vardhman Textiles लुधियाना (पंजाब) की कंपनी है, जो सूती व सिंथेटिक धागा, ग्रे (बिना रंगा-छपा) और रंगाई-छपाई वाला कपड़ा, सिलाई का धागा, एक्रिलिक फाइबर तथा गारमेंट बनाती है; इसके और इसकी समूह कंपनियों के कारखाने पंजाब, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और हरियाणा में भी हैं, और सिलाई का धागा व एक्रिलिक फाइबर इसी समूह की अलग कंपनियों के जरिए बनता है। Welspun Living घर में इस्तेमाल होने वाले टेक्सटाइल पर टिकी है, यानी तौलिए, बेडशीट, कालीन और फर्श का सामान, जिसके कारखाने गुजरात (वापी और अंजार) तथा तेलंगाना में हैं, और अमेरिका के ओहायो में इसकी तकिए बनाने की एक इकाई भी है।
यह उद्योग किन बातों से प्रभावित होता है
ये वे बातें हैं जिनका असर इस उद्योग पर आमतौर पर पड़ता है — यह भविष्यवाणी नहीं कि आगे क्या होगा।
- इस समूह की ज्यादातर कंपनियों का मुख्य कच्चा माल रुई (कपास) है, और रुई का दाम फसल, मानसून और दुनिया भर में रुई की उपलब्धता पर निर्भर करता है। सरकार हर कपास सीजन (अक्टूबर से सितंबर) के लिए कपास की MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है, और भाव MSP से नीचे जाने पर भारतीय कपास निगम (Cotton Corporation of India) किसानों से कपास MSP पर खरीदता है। इससे रुई के दाम को एक तरह की न्यूनतम सीमा मिल जाती है, जो किसान के लिए सहारा है पर मिलों के लिए लागत। बाहर से आने वाली रुई पर आम तौर पर 11% सीमा शुल्क (import duty) लगता है, पर सरकार इसे समय-समय पर कुछ महीनों के लिए हटाती रही है: अगस्त से दिसंबर 2025 तक यह हटा था, और 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक फिर हटाया गया है। शुल्क लगने या हटने से आयातित रुई की लागत बदलती है। धागा और कपड़ा बनाने वाली K.P.R. Mill, Trident और Vardhman Textiles के लिए यह सीधे लागत का मामला है, और असर होम टेक्सटाइल बनाने वालों तक भी पहुंच सकता है।
- कुछ कंपनियां मुख्य रूप से विदेश भेजने के लिए बनाती हैं और कुछ भारत में बेचने के लिए, इसलिए एक ही खबर का असर सब पर एक जैसा नहीं होता। Trident के तौलिए और बेडशीट तथा Welspun Living के तौलिए, बेडशीट, कालीन और फर्श का सामान बड़े हिस्से में विदेशी बाजारों में जाते हैं, जिनमें अमेरिका का होम टेक्सटाइल बाजार सबसे बड़ा है; वहां के बड़े रिटेल स्टोर तय मौकों पर बड़े ऑर्डर देते हैं और गोदाम में पड़े माल के हिसाब से अगला ऑर्डर घटाते-बढ़ाते हैं। K.P.R. Mill के तैयार कपड़े भी बड़े हिस्से में यूरोप और अमेरिका जाते हैं। दूसरी तरफ Page Industries का कारोबार मुख्य रूप से भारत की दुकानों और ऑनलाइन बिक्री पर टिका है, इसलिए उस पर विदेशी ऑर्डर के चक्र के बजाय यहां लोगों की खर्च करने की क्षमता, त्योहारों का मौसम और नए स्टोर खुलने का असर ज्यादा पड़ता है। सितंबर 2025 से लागू GST ढांचे में 2,500 रुपये तक के तैयार कपड़ों पर 5% और उससे ऊपर 18% GST है, जिसका असर दुकान की कीमत पर पड़ता है।
- भारत से बना कपड़ा जिन देशों में जाता है वहां उस पर आयात शुल्क लगता है, और शुल्क बदलने पर वहां की कुल कीमत बदल जाती है। इसी बाजार में बांग्लादेश, वियतनाम और चीन का माल भी बिकता है, जिस पर शुल्क अलग हो सकता है, इसलिए शुल्क का फर्क मुकाबले की स्थिति बदल देता है। मुक्त व्यापार समझौते (FTA) यही काम उल्टी दिशा में करते हैं: भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ है, जिससे ब्रिटेन में भारतीय कपड़ों पर पहले लगने वाला शुल्क हटा है। अमेरिका ने 2025 में भारत से आने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाए थे, और फरवरी 2026 में अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा बनने के बाद कपड़े और गारमेंट पर यह दर घटाकर 18% कर दी गई। ऐसी दरें आगे भी बदल सकती हैं, और जिन कंपनियों की बिक्री का बड़ा हिस्सा किसी एक देश से आता है, उन तक असर ज्यादा पहुंच सकता है।
- निर्यात करने वाली कंपनियों को भुगतान अक्सर डॉलर, पाउंड या यूरो में मिलता है, जबकि उनका ज्यादातर खर्च, यानी रुई, मजदूरी और बिजली, रुपये में होता है। इसलिए रुपये और डॉलर की विनिमय दर बदलने पर उतने ही डॉलर के ऑर्डर से मिलने वाली रुपये की रकम बदल जाती है। यह असर तुरंत और पूरा नहीं दिखता, क्योंकि कंपनियां आम तौर पर फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट (आगे की तारीख के लिए पहले से तय दर पर विदेशी मुद्रा खरीदने-बेचने का सौदा) करके अपनी दर पहले ही तय कर लेती हैं। दूसरी तरफ जो कंपनियां बाहर से रुई, मशीनें या रसायन मंगाती हैं, उनके लिए रुपया कमजोर होने पर आयात महंगा पड़ता है, इसलिए एक ही कंपनी में दोनों तरफ का असर हो सकता है।
- सरकार की योजनाएं इस क्षेत्र की लागत और निवेश का हिसाब बदलती हैं। PLI (उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना) टेक्सटाइल में मुख्य रूप से मानव निर्मित रेशे (MMF) से बने कपड़े, गारमेंट और तकनीकी टेक्सटाइल के लिए है। तकनीकी टेक्सटाइल यानी ऐसे कपड़े जो पहनने के लिए नहीं, किसी काम के लिए बनते हैं, जैसे सड़क में बिछने वाला या अस्पताल में इस्तेमाल होने वाला कपड़ा। इसलिए सूती कपड़े पर टिकी कंपनियां इसके दायरे में जरूरी नहीं आतीं। PM MITRA के तहत सात राज्यों में बड़े एकीकृत टेक्सटाइल पार्क बनाए जा रहे हैं, जहां धागे से तैयार कपड़े तक की इकाइयां एक ही जगह लग सकती हैं, और तेलंगाना के वारंगल पार्क में उत्पादन शुरू भी हो चुका है।
- निर्यात पर RoSCTL और RoDTEP योजनाओं के तहत उन करों और शुल्कों की भरपाई की जाती है जो सामान बनाने में लगे पर GST में वापस नहीं मिलते। फिलहाल इन दोनों को 30 सितंबर 2026 तक ही मंजूरी मिली है, और आगे बढ़ाने पर फैसला होना बाकी है। ATUFS नाम की योजना में नई मशीनें लगाने पर पूंजी सब्सिडी मिलती थी, पर वह मार्च 2022 में खत्म हो चुकी है। बजट 2026-27 में टेक्सटाइल के लिए एक एकीकृत कार्यक्रम की घोषणा हुई है, जिसमें पुराने क्लस्टरों में मशीन और तकनीक सुधारने के लिए पूंजी सहायता, रेशों के लिए अलग योजना और कामगारों की ट्रेनिंग शामिल हैं। इन योजनाओं की शर्तें, दरें और अवधि बदलने पर कंपनियों की लागत और नया निवेश करने के फैसलों पर असर पड़ सकता है।
इस उद्योग के सारे 5 शेयर
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| शेयर | बंद भाव | आज | हाई से | RSI | 1 साल की सबसे बड़ी गिरावट |
|---|---|---|---|---|---|
| वेलस्पन लिविंग | ₹229.58 | +1.53% | -6.48% | 60.44 | 27% |
| पेज इंडस्ट्रीज | ₹36,630.00 | -1.27% | -16.47% | 48.6 | 30% |
| केपीआर मिल | ₹1,121.20 | +3.07% | -15.95% | 54.09 | 28% |
| वर्धमान टेक्सटाइल्स | ₹535.25 | +2.77% | -22.2% | 43.45 | 22% |
| ट्राइडेंट | ₹22.32 | +0.72% | -27.86% | 40.86 | 26% |
भाव स्प्लिट और बोनस के हिसाब से समायोजित हैं। तरीका: पिछले साल की गिरावट का डेटा।